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Mukhtar Ansari: मुख्तार अंसारी को हाईकोर्ट ने सुनाई दो साल की सजा, लखनऊ के जेलर को धमकाने का है मामला

माफिया मुख्तार अंसारी को हाई कोर्ट ने 22 साल पुराने एक मामले में दो साल की सजा सुनाई है. मार्च 2000 में तत्कालीन जेलर को धमकाने के मामले में अंसारी को सजा हुई है.


इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने राजधानी के आलमबाग थाने के एक आपराधिक मामले में माफिया मुख्तार अंसारी को दोषी करार देते हुए अलग-अलग धाराओं में सात साल की सजा सुनाई है. राजधानी के आलमबाग थाने के एक आपराधिक मामले में माफिया मुख्तार अंसारी को दोषी करार दिया है. यह निर्णय न्यायमूर्ति दिनेश कुमार सिंह की एकल पीठ ने राज्य सरकार की अपील को मंजूर करते हुए पारित किया.

बता दें कि मुख्तार अंसारी बांदा जेल में बंद है. जेलर को धमकाने वाले मामले में सजा सुनाई गई है.  2000 में आलमबाग में केस दर्ज हुआ था.  कोर्ट ने आईपीसी की धारा 506 के तहत मुख्तार अंसारी को 7 साल की सजा सुनाई और 25 हजार रुपए का जुर्माना लगाया है. हाईकोर्ट ने आईपीसी की धारा 353 के तहत 2 साल की सजा और लगाया 10 हजार रुपये जुर्माना लगाया है. वहीं आईपीसी की धारा 504 के तहत दो साल की सजा और 2 हज़ार रुपये का जुर्माना लगाया. सभी सजा साथ-साथ चलने का कोर्ट ने फैसला दिया है. कुल मिलाकर 7 साल की सज़ा सुनाई गई है.

ये था मामला
मामले में वर्ष 2003 में तत्कालीन जेलर एसके अवस्थी ने थाना आलमबाग में मुख्तार के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई थी.  मामले में वर्ष 2003 में तत्कालीन जेलर एसके अवस्थी ने थाना आलमबाग में मुख्तार के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई थी. सके अनुसार  जेल में मुख्तार अंसारी से मिलने आए लोगों की तलाशी लेने का आदेश देने पर उन्हें जान से मारने की धमकी दी गई थी. गाली गलौज करते हुए मुख्तार ने उन पर पिस्तौल भी तानी थी. स मामले में ट्रायल कोर्ट ने मुख्तार को बरी कर दिया था, जिसके खिलाफ सरकार ने अपील दाखिल की थी.

जानें कौन हैं मुख्तार अंसारी?
गौरतलब हो कि अभी मुख्तार अंसारी अभी बांदा जेल में बंद हैं और उनकी सुरक्षा के लिए जेल प्रशासन के साथ कानपुर के एक डिप्टी जेलर की ड्यूटी लगाई गई है. अपराध की दुनिया से राजनीति में कदम रखने वालों में से एक नाम मुख्तार अंसारी का भी शामिल है. मुख्तार अंसारी यूपी की सियासत का जाना-माना नाम है. मुख्तार अंसारी का जन्म यूपी के गाजीपुर जिले में हुआ.मुख्तार के दादा अहमद अंसारी अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रहे थे.जबकि पिता एक कम्युनिस्ट नेता थे. जैसे ही मुख्तार की पढ़ाई पूरी हुई उन्होंने अपनी अलग राह चुन ली, जिसके बाद उनकी जिंदगी ऐसी हो गई जैसे कोई फिल्मी दुनिया हो.

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